भारतीय मंदिर वास्तुकला केवल ईंट, पत्थर और गारे से निर्मित भौतिक ढांचों का समूह मात्र नहीं है, बल्कि यह भौतिक ब्रह्मांड और आध्यात्मिक चेतना के बीच संतुलन स्थापित करने वाला एक अत्यंत गहन दार्शनिक, गणितीय और ज्यामितीय विज्ञान है (क्रैमरिश, 1946, पृ. 12-15)।
प्राचीन वैदिक युग में जहां उपासना मुख्य रूप से खुले आकाश के नीचे यज्ञ वेदियों और अग्नि कुंडों पर होती थी, वहीं समय के साथ देव-प्रतिमाओं को स्थापित करने के लिए एक स्थायी आश्रय की आवश्यकता महसूस हुई। इसी आवश्यकता ने मंदिर निर्माण कला को जन्म दिया, जो गुप्त काल में प्रस्तर (पत्थर) वास्तुकला के रूप में परिपक्व हुई (देव, 1969, पृ. 8-10)।
मंदिर निर्माण के क्रमिक चरण: गुप्त काल का वास्तुशिल्पीय परिष्कार
भारतीय मंदिर वास्तुकला के सर्वाधिक स्पष्ट और संरचनात्मक प्रमाण चौथी से छठी शताब्दी ईस्वी के बीच गुप्त काल में मिलने शुरू होते हैं। कला इतिहासकारों (जैसे पर्सी ब्राउन) ने इस विकास क्रम को मुख्य रूप से पाँच क्रमिक चरणों में विभाजित किया है (ब्राउन, 1956, पृ. 45-48):
प्रथम चरण (आरंभिक सपाट छत वाले मंदिर): इस प्रारंभिक चरण में निर्माण की शैली अत्यंत सादी और वर्गाकार थी। मंदिर एक कम ऊंचाई वाले चबूतरे (अधिष्ठान) पर स्थित होता था, जिस पर एक वर्गाकार गर्भगृह और उसके ठीक सामने चार साधारण स्तंभों पर टिका एक उथला मंडप होता था (एनसीईआरटी, भाग 1, अध्याय 6)। मध्य प्रदेश के सांची स्थित ‘मंदिर संख्या 17’ इस शैली का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ स्थानीय बलुआ पत्थर को बिना गारे के केवल एक-दूसरे के ऊपर अत्यंत सटीकता से ‘इंटरलोकिंग तकनीक’ द्वारा जोड़कर रखा गया था (ब्राउन, 1956, पृ. 46)।
द्वितीय चरण (प्रदक्षिणा पथ का प्रादुर्भाव): इस चरण का सबसे युगांतरकारी विकास गर्भगृह के चारों ओर एक ढके हुए ‘प्रदक्षिणा पथ’ का निर्माण था। प्रवेश द्वारों के सिरदल (Lintels) पर विस्तृत नक्काशी की जाने लगी और मंडप की पार्श्व दीवारों पर मकर (मगरमच्छ) और कूर्म (कछुआ) पर सवार क्रमशः गंगा और यमुना जैसी नदी देवियों की आकृतियां उकेरी जाने लगीं (देव, 1969, पृ. 14-16)। मध्य प्रदेश के तिगवा स्थित कंकाली देवी मंदिर और नचना कुठारा का पार्वती मंदिर इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
तृतीय चरण (शिखर का उदय और पंचायतन लेआउट): यह एक निर्णायक मोड़ था जहाँ से ‘नागर शैली’ का उद्भव माना जाता है। सपाट छत का स्थान अब एक वर्गाकार या वक्ररेखीय टावर ने ले लिया, जिसे ‘शिखर’ कहा गया। इसी चरण में ‘पंचायतन शैली’ का विकास हुआ, जहाँ मुख्य मंदिर चबूतरे के केंद्र में और चार छोटे सहायक देवस्थान चारों कोनों पर बनाए जाते थे (क्रूस के आकार का लेआउट) (एनसीईआरटी, भाग 1)। उत्तर प्रदेश के देवगढ़ स्थित ‘दशावतार मंदिर’ इसका सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है (ब्राउन, 1956, पृ. 48)।
चतुर्थ चरण (आयताकार योजना और गजपृष्ठाकार छत): इस चरण के मंदिरों का आधार वर्गाकार न होकर आयताकार होने लगा। इनका पिछला हिस्सा अर्ध-गोलाकार (Apsidal) और छत ‘बैरल-वॉल्टेड’ यानी गजपृष्ठाकार (हाथी की पीठ के समान) होती थी (मेइस्टर एवं ढाकी, 1988)। यह वास्तुकला बौद्ध चैत्य गृहों की संरचना से गहराई से प्रेरित थी। आंध्र प्रदेश का कपोतेश्वर मंदिर (चेज़रला) इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।
पंचम चरण (पक्की ईंटों और मेहराब का प्रयोग): इस चरण में संरचनात्मक चापों या ‘कोर्बेल्ड आर्च’ (Corbelled arches) का प्रयोग शुरू हुआ, जिससे बिना विशाल प्रस्तर खंडों के बड़े प्रवेश द्वार और छतें बनाना संभव हो गया। उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में स्थित ‘भीतरगांव का मंदिर’ इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है, जो टेराकोटा (पक्की मिट्टी) की ईंटों से निर्मित सबसे पुराना जीवित हिंदू मंदिर है (देव, 1969, पृ. 28; एनसीईआरटी, भाग 1)।
मंदिर वास्तुकला के अन्य संरचनात्मक अंग (Anatomy of a Temple)
प्राचीन वास्तुशास्त्र के अनुसार, मंदिर का बाहरी और आंतरिक हिस्सा अत्यंत सूक्ष्मता से डिज़ाइन किया जाता है। इसके मुख्य भौतिक अंग इस प्रकार हैं (क्रैमरिश, 1946, भाग 2)।
अधिष्ठान (The Plinth): अधिष्ठान केवल एक चबूतरा नहीं है, बल्कि यह कई नक्काशीदार परतों से बना होता है (मेइस्टर एवं ढाकी, 1988)उपान: सबसे निचली सादा परत जो नींव का आधार बनती है।
कुमुद: ‘सफेद कुमुदिनी’ के समान गोल या बहुकोणीय परत।
कपोत: कबूतर के सिर जैसी ढालू बनावट, जो बारिश के पानी को दूर रखने का कार्य करती है।
मंडोवर और जंघा (The External Façade and Thigh):
मंडोवर: मंदिर की दीवारों के बाहरी हिस्से को मंडोवर कहा जाता है, जो मंदिर का सबसे अधिक नक्काशीदार हिस्सा होता है (देव, 1969, पृ. 35)।जंघा: जंघा मंडोवर का ही एक हिस्सा है, जिसे “मंदिर की जांघ” कहा जाता है। इसे दो भागों में विभाजित किया जाता है:
‘तल जंघा’ (जहाँ मुख्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ होती हैं) और ‘उपर जंघा’ (जहाँ अप्सराओं या सहायक देवताओं की प्रतिमाएँ होती हैं)।
स्तंभ के भाग (Pillars):
गुप्तकालीन और उत्तर-गुप्तकालीन मंदिर स्तंभों को भार वहन क्षमता के आधार पर तीन तकनीकी अंगों में विभाजित किया जाता है (ब्राउन, 1956, पृ. 52):
लशुन: स्तंभ का ‘कंधा’ जो घंटी के आकार का हो सकता है।
मंडी: प्याले के आकार की संरचना जो ऊपर के भार को सहती है।
पोतिका: ब्रैकेट जो छत की कड़ियों को सहारा देता है।
संदर्भ ग्रंथ सूची (Bibliography)
ब्राउन, पर्सी (1956). इंडियन आर्किटेक्चर (बुद्धिस्ट एंड हिंदू पीरियड्स). बॉम्बे: डी. बी. तारापोरवाला सन्स एंड कंपनी.
क्रैमरिश, स्टेला (1946). दि हिंदू टेम्पल (वॉल्यूम 1 और 2). कलकत्ता: कलकत्ता विश्वविद्यालय (पुनर्मुद्रण: मोतीलाल बनारसीदास).
देव, कृष्ण (1969). टेम्पल्स ऑफ नॉर्थ इंडिया. नई दिल्ली: नेशनल बुक ट्रस्ट (NBT).
मेइस्टर, माइकल डब्ल्यू. एवं ढाकी, एम. ए. (1988). एन्साइक्लोपीडिया ऑफ इंडियन टेम्पल आर्किटेक्चर: नॉर्थ इंडिया (फाउंडेशन ऑफ नॉर्थन स्टाइल). नई दिल्ली: अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन स्टडीज.
एनसीईआरटी / NCERT (2020). “Temple Architecture and Sculpture,” भारतीय कला का परिचय (भाग 1), अध्याय 6. नई दिल्ली: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद.
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